बद्रीनाथ धाम की कहानी

बद्रीनाथ धाम की कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार दंबोदर्व नाम का एक राक्षस था
। जो की भगवान सूर्य देव का बहुत बड़ा भक्त था । उसने सूर्य देव को घोर तपस्या करके प्रसन्न किया ओर अमृतवा का वरदान माँगा । सूर्य देव ने अमृतवा का वर देने से इंकार कर दिया उन्होंने कहा जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, इसलिए तुम कोई ओर वर मांगो मई तुम्हे वह वर दूंगा ।
उसने भगवान सूर्य देव से एक सहस्त्र कवच देने को कहा, और मेरा एक कवच वही तोड़ सके जो जिसने दस हज़ार वर्ष की तपस्या की हो । सूर्य देव वचनवध थे तो उन्होंने उसे वरदान दे दिया । सहस्त्र कवच होने के कारण दंबोदर्व का नाम सहस्त्र कवच पड गया ।
उसके बाद सहस्त्र कवच अपने आप को अमर समझने लगा । और उसने तीनो लोको में उत्पात मचा दिया । फिर सभी देवगण अपनी समस्या लेकर श्री नारायण भगवान् विष्णु के पास गए तो भगवान् विष्णु ने देवताओं को आश्वासन दिया की मैं शीघ्र ही इसका कोई उपचार करूंगा ।
फिर भगवान् विष्णु आत्मचिंतन में लीन हो गए की सहस्त्र कवच का वध कैसे किया जाये । फिर उन्होंने अपने दिव्य दृष्टि से देखा की पृथ्वी लोक के हिमालय के केदार खंड में एक सा स्थान है, जहाँ एक दिन तपस्या करने का फल दस हज़ार वर्ष के बराबर होता है ।
भगवान नारायण केदार खंड गए तो वहां उन्होंने देखा की महादेव शिव और माता पार्वती वहां पहले से ही निवास करते हैं ।तो उनसे यह जगह कैसे मांगे, फिर नारायण ने एक लीला रची वह ऋषि गंगा के समीप जाकर एक शिला मे उन्होंने एक नन्हे बालक का रूप लिया और जोर जोर से रोने लगे । उस शिला को लीला ढूँगी के नाम से जाना जाता है । बालक की रोने के आवाज तीनो लोको में गूंजने लगी । भगवान महादेव शिव, नारायण की लीला को समझ चुके थे । लेकिन जगत माता पार्वती, ममता के अधीन होकर ये न जान पायी की यह नारायण की लीला है. माँ पार्वती ममता से विभोर होकर भगवान् शिव से कहने लगी,इस प्यारे से बालक को न जाने कौन यहाँ छोड़ गया है मुझसे अब इसका रोना नहीं देखा जाता, अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं बालक को देख के आ जाऊ, भगवान शिव जो, भगवान् नारायण की लीला को जान चुके थे उसका आनंद ले रहे थे, फिर उन्होंने माता से कहा जिसका बालक होगा वो स्वयं ही ले जायेगा अगर आपको फिर भी जाना है तो आप बालक को देख के आ जाओ । माँ पार्वती बालक के पास गयी और नारायण के उस सुंदर बालक के रूप को देख कर बालक को गोदी में उठाये बिना नहीं रह पायी, बालक भी माता की गोदी में जाकर शांत हो गया । फिर माता उस बालक को अपने साथ ले गयी और भगवान शिव से कहा की इस नन्हे से बालक को मैं अपने पास यही रख लूँ । महादेव जो नारायण की लीला को देख कर मन ही मन मुस्करा रहे थे माता से बोले रख तो लो पर बाद में पछताना मत । माता ने कहा यह तो बालक है, इसको अपने साथ रखने मे पछताना कैसा और फिर माता ने उस बालक को सुला दिया । माता पार्वती और भगवान शिव स्नान ध्यान करने गए और जब वापस आये तो देखा जहाँ बालक थे वहां चतुर्भुजी श्री नारायण हैं । माता ने नारायण को देखा और कहा आप यहाँ कैसे आपके यहाँ आने का प्रयोजन और बालक कहाँ गया । भगवान नारायण मुस्कराये और बोले माँ आपका वो बालक मैं ही हूँ ।
मैं जग कल्याण हेतु यहाँ ध्यान लगाने आया हूँ । यह स्थान बड़ा ही दिव्या हैं, मुझे जब पता चला की यह स्थान में आप रहते हो तो मुझे यह लीला करनी पड़ी ताकि आप स्वयं ही यह स्थान मुझे दे दें, और आपने ही यह स्थान मुझे दिया हैं ।
माँ पार्वती और महादेव शिव ने यह स्थान फिर श्री नारायण को दें कर स्वयं केदारनाथ में चले गए । जिस स्थान से भगवान शिव और माता गए उस स्थान को आदिकेदारेश्वर के नाम से जाता हैं । यहाँ आज भी भगवान विष्णु के बाल रूप के पद चिह्न हैं।
फिर नारायण ध्यान चिंतन (आत्मम चिंतन) में लीन हो गए। उनके धरती लोक में ध्यान चिंतन में लीन होने के कारण माता लक्ष्मी व्याकुल हो गयी। वह सोचने लगी की प्रभु की सेवा कैसे करू। माता लक्ष्मी भी केदार खंड आ गयी और जहाँ नारायण आत्म चिंतन लीन थे वहां पे बद्री (बेर) का पेड़ के रूप में नारायण को धूप, बारिश, बर्फ से बचाने लगी ताकि श्री नारायण को आत्म चिंतन में को परेशानी न आये। जब श्री नारायण का ध्यान टुटा तो वह माता लक्ष्मी कि सेवा से बहुत प्रस्सन हुए और माता को वरदान दिया कि आपने बद्री के वृक्ष के रूप में मेरी सेवा कि है, तो मेरा यह प्रिया स्थान बद्री नारायण (बद्रीनाथ) के नाम से विख्यात होगा और जब कभी भी मेरा नाम लिया जायेगा तो मेरे नाम से पहले आपका नाम लिया जायेगा। उसके बाद से ही माता का नाम श्री नारायण से पहले लिया जाता है जैसे बद्रीनाथ, सीताराम, राधाश्याम, लक्ष्मीनारायण।
उसके बाद श्री नारायण ने धर्म और उनकी पत्नी रूचि जो कि भगवान् विष्णु के अनन्य भक्त थे और श्री नारायण कि पुत्र प्राप्ति के लिए तपस्या कर रहे थे। उनके घर में नर, नारायण के रूप में अवतार लिया। नर, नारायण अपनी बाल्यावस्था में ही जगकल्याण हेतु अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर तपस्या करने बद्री का आश्रम आ गए।
तत्पश्चात अलकनंदा के दायीं और बायीं ओर नर, नारायण तपस्या करने लगे। जिस पर्वत पर नर ने तप किया उसे नर पर्वत तथा जिस पर नारायण ने तप किया उसे नारायण पर्वत के नाम से जाना जाता है।
जब नर, नारायण के तप के प्रभाव तीनो लोको में फैल गया । उनकी घोर तपस्या का पता जब सहस्त्र कवच को चला तो वह नर, नारायण से युद्ध करने बद्री का आश्रम में आ गया। फिर पहले दिन नारायण ने युद्ध किया और सहस्त्र कवच का एक कवच तोड़ दिया, अगले ने नारायण तप करने लगे तो नर ने उसका दूसरा कवच तोड़ दिया फिर यही शिलशिला चलता रहा।
एक दिन नर तप करते तो उस दिन नारायण लड़ते, अगले दिन नारायण तप करते तो नर लड़ते। ऐसा करते-करते सहस्त्र कवच के 1999 कवच तोड़ दिए। फिर सहस्त्र कवच डर के भागने लगा और उसके पीछे नर, नारायण करने लगे तो वह भाग कर सूर्य देव की शरण में चला गया ।
सूर्य देव ने फिर भगवान् नर, नारायण से बिनती की, कि प्रभु अभी यह मेरी शरण में है और मेरा धर्म इसकी रक्षा करना है। तो दया करके सहस्त्र कवच को अभी छोड़ दें ।
श्री नारायण ने सूर्य देव की बात रखते हुए उन्हें कहा कि अभी तो में इसे छोड़ देता हूँ, किन्तु द्वापरयुग में आपको इसे कुंती के आवाहन करने पर अपने पुत्र के रूप ने भेजना होगा। उस समय मैं कृष्ण अवतार में रहूँगा और नर, अर्जुन के अवतार में तब इसकी मिर्त्यु अर्जुन के हाथों से होगी।
नर, नारायण वापस बद्री का आश्रम आकर तप करने लगे। कुछ समय बाद भगवान् नारायण ने देवताओं से कहा बद्री का आश्रम से, नारद शिला के नारद कुंड के नीचे से उनकी मूर्ति निकालो और उसकी स्थापना करो, क्योंकि कलयुग का आरम्भ होने वाला है और मैं साक्षात् रूप में नहीं रह सकता, उस मूर्ति कि जो भी प्राणी दर्शन करेगा उसे मेरे साक्षात् दर्शन करने का फल प्राप्त होगा। जो भी यहाँ सच्चे मन से आएगा उसे मोक्ष कि प्राप्ति होगी।
बोलो बद्री विशाल लाल के जय ।