अब कहाँ बचे वह गाँव जो, हवेली जैसे होते थे,

गाँव

अब कहाँ बचे वह गाँव जो, हवेली जैसे होते थे,
सभी घरों से सबके साझे, रिश्ते नाते होते थे।
ताऊ चाचा बाबा दादा, सांझी होती गाँव की बेटी,
खेतों तक पगडंडी होती, पीपल के साये होते थे।
जाति धर्म होता था पर, सबकी मर्यादाएँ भी थी,
अलग-अलग बस्ती, पर सुख दुःख सांझे होते थे।
बड़े मॉल सा गाँव जहाँ पर, सब सुविधा मिल जाती,
पैसा कम था उस दौर में, पर काम सभी के होते थे।

अ कीर्ति वर्द्धन