नही आती है कविता कहनी मुझको नहीं आता है कोई गीत

नही आती है
कविता कहनी मुझको
नहीं आता है
कोई गीत सुनाना
फिर कैसे
कह दूँ मैं कविता
फिर कैसे
मैं गीत सुनाऊँ
जब नहीं है
कोई सुर
मेरे पास
जब नहीं है
कोई ताल
बस हैं दिल का
करूण क्रंदन
साथ हैं जिसके
मेरे भाव
जो लिख लेता हूँ
डूबाकर स्याही मे
जज्बातों की
जिनमे होता है
अपार नेह
तेरे लिये

विपुल शर्मा

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