डॉ अ कीर्तिवर्धन की सद्य प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ “डॉक्टर कीर्ति वर्धन साहित्य साधना और व्यक्तित्व” अपने आप में बेजोड़ है, अनुपम है और अंगूठा भी है

अनुपम अभिनंदन ग्रंथ

डॉ अ कीर्तिवर्धन की सद्य प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ “डॉक्टर कीर्ति वर्धन साहित्य साधना और व्यक्तित्व” अपने आप में बेजोड़ है, अनुपम है और अंगूठा भी है। लगभग 336 पृष्ठ की यह महान ग्रंथ महान लेखक चिंतक समाजसेवी और साहित्य अन्वेषी तथा एक सशक्त लोकप्रिय कवि की जिसने अपनी लोकप्रियता की पताका साहित्य आकाश में गाड़ दी है।
डॉक्टर कीर्ति वर्धन की कविताएं मानव जीवन पर घटने वाली प्राकृतिक घटनाओं एवं सुख दुख में उलझे हुए मानव का मार्ग प्रशस्त कर मंजिल की राह में उलझे हुए मानव का मार्ग प्रशस्त कर मंजिल की तलाश करती दिखाई देती हैं तो कभी अकेलेपन का एहसास अपने पक्ष को तो तलाशता नजर आता है, उस जन्म की खातिर, उस जन्म के बाद कोई मृत्यु नहीं।

आज समाज विद्वेष, प्रतिस्पर्धा, मूल्य हीनता, दोहरे आचरण तथा स्वार्थ पूर्ण संकुचित दृष्टि का शिकार है। इसका आईना न चटका हुआ है अपितु नकली और बनावटी भी है, यहां आदमी केवल नकाब और मुखौटों में मिलते हैं।
इस महान अभिनंदन ग्रंथ में लगभग 105 कवि कवित्रीयों लेखक लेखिकाओं और युवा साहित्यकारों की रचनाएं विचारोत्तेजक और पठनीय हैं। इस ग्रंथ के संपादक सुप्रसिद्ध लेखक और दर्जनों पुस्तकों के लेखक श्री अश्वनी कुमार आलोक हैं जिन्होंने अपनी रात दिन की लगन और प्रचंड गर्मी की मार में अपनी श्रम सीकर बहाकर इस ग्रंथ का सुंदर संपादन किया है जो अपने आप में बेजोड़ हैं, अनुपम है तथा अनूठा है। अतः इस महान साहित्य कार्य के लिए उन्हें कोटिश बधाइयां और अनेकानेक साधुवाद।
कीर्ति वर्द्धन जी की कविताएं मन की गांठ को खोलने सुलझाने के साथ ही तरह की स्थितियों को व्यक्त करती हैं।
मानव संबन्धो को बखूबी मुखरित करती इनकी कविताओं को माध्यम बनाकर किसी विचारधारा को आरोपित तो नहीं किया जा सकता है, परन्तु युद्धरत आम आदमी के पक्ष में ये कविताएं पूरी मजबूती के साथ खड़ी दिखती हैं। कवि कीर्ति वर्द्धन जी अपनी अभिव्यक्ति में निडर और पारदर्शी हैं और एक ईमानदार लेखक की तरह अपनी कलम चलाते रहते हैं।

कविता भाषा के माध्यम से देखा गया मनुष्य का स्वपन है। कवि की विश्व दृष्टि जितनी व्यापक होती है, उसका स्वपन भी उतना ही यथार्थवादी होता है और उसकी कविता उतनी ही सर्वजनीन होती है। जिस तरह सपनों की जड़ें हमारे अपने व्यक्तित्व और परिवेश में गहरे जुड़ी होती हैं, सपने हमें उन जड़ों के भी पार पहुंचा देते हैं, उसी तरह कविता की जडें भी कवि के व्यक्तित्व और परिवेश में होते हुए भी श्रेष्ठ कवि इनके अतिक्रमण को बाध्य होता है।
जहां तक अतिक्रमण सिद्ध नहीं हो पाता, वहां कविता व्यक्ति और परिवेश परिवेश की सीमाओं में सिकुड़ कर रह जाती है और किसी व्यापक प्रभाव की पुष्टि नहीं कर पाती। फिर भी कविताएं लिखी जाती हैं, सपने देखे जाते हैं- क्या पता कब कौन स्वपन महास्वपन बन जाए और उससे उपजी कौन सी कविता लोकमंगल की साधना और सौंदर्य की सृष्टि का दर्जा पा जाए। कवि डॉक्टर कीर्ति वर्धन जी ने अपनी कविताओं में ऐसे ही कुछ सपने देखे हैं, कुछ कविताएं रची हैं, जिनमें भावी श्रेष्ठ कविता की संभावनाएं देखी जा सकती हैं जिसके लिए उन्हें व्यक्ति और परिवेश के बीचो-बीच रहते हुए उनके पार जाना होगा।
डॉक्टर कीर्ति वर्धन जी की कई पुस्तकें मुझे पढ़ने का शुभ अवसर प्राप्त हो चुका है उनकी दो पुस्तकों की समीक्षाएं भी लिखी हैं। अधिकांश कविताएं मानवीय संवेदनाओं को लिए अपने जीवन के आसपास रखते हुए जन-जन को समर्पित किए विषयों पर रची बुनी है, जो गहरी संवेदना और विलक्षण कल्पना शक्ति प्रतिबिंबित करती हैं।
इन कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि कवि के मन में आज सामाजिक पारिवारिक समस्याओं और जीवन के अनगिनत दर्दों के प्रति गहरा आक्रोश है। उसे बार-बार लगता है कि इन समस्याओं का समाधान हम ही हैं, केवल हम। आज व्यक्ति पूरा जीवन जी लेता है, सब कुछ सीख लेता है, औपचारिक जानकारियां हासिल करना करता जाता है पर कुछ बनने की होड़ में एक इंसान नहीं बन पाता।
आज का आदमी हिंसात्मक स्वरूप में इतना उलझ कर रह गया है कि रजनीगंधा और गुड़हल के मनभावन प्यार के फूल उसकी बगिया से खोते चले जाते हैं।
कविता की आत्मा नहीं मरनी चाहिए बस। डॉ अ कीर्ति वर्द्धन इस मामले में बिल्कुल खरे उतरे हैं। बेहद उम्दा ढंग से मन की बात को कागज पर उतारा गया है, जो सीधे दिल और दिमाग में प्रवेश कर रहा है। कवि इतिहास रचने की वकालत करते हैं। कवि आशाओं के दीप जलाना चाहते हैं ताकि अंधेरा मिट सके। बालक को शिक्षित करना चाहते हैं ताकि भारत को शिक्षित बनाया जा सके। धरती पर वृक्ष लगाना चाहते हैं ताकि धरती माता को हरा भरा किया जा सके। युद्ध उन्मादी लोगों के बीच शांति के बीज बोना चाहते हैं, ताकि समग्र विश्व को ज्ञान से जीता जा सके। कवि की ख्वाहिश है कि विस्तृत फलक हैं-

मानवता को धर्म बनाकर
सात्विकता जीवन में लाएं,
जात पात का भेद मिटाकर
आओ एक इतिहास रचायें।

समाज में नैतिकता का ह्रास हो रहा है नैतिकता का पाठ कोई पढ़ना नहीं चाहता। गला काट प्रतियोगिता में नैतिकता का कोई नाम लेवा नहीं है। जबकि नैतिकता का समाज में होना जरूरी है। कवि कीर्तिवर्धन ने भ्रष्ट आचरण की आंधी में सच्चाई की जोत जलाने की वकालत की है और कहा है कि सुख समृद्धि की अभिलाषा में किसी भी कीमत पर पाप के रास्ते पर नहीं चला जाए।कवी का आह्वान है कि-

जीवन के हर पल में तुम भी,
नैतिकता के दीप जलाओ
निराश भाव को दूर भगाकर
घर-घर में उजियारा लाओ।

यूं तो डॉक्टर कीर्तिवर्धन की सारी रचनाएं उच्च स्तरीय एवं प्रभावोंत्पादक ही होती हैं, किंतु उनकी कविताएं ज्यादा आकृष्ट करती हैं। ऐसा इसलिए कि वह “साहितष्य भावं साहित्यम” के मर्म को बखूबी जानते हैं। उनका कवि हृदयउनका सर्व धर्म समभाव के प्रति उदग्रीव और समर्पित रहता है। यही कारण है कि वह साहित्यकार नामक कविता में अपने समानधर्मी साहित्यकारों का आह्वान करते हुए कहते हैं

आओ हम सब जुट जायें,
अपनी संस्कृति बचाने में
सभी विद्या के साहित्यकारों को
एक मंच पर लाने में।
पश्चिम की संस्कृति का भी
कभी नहीं अपमान करें,
लेकिन अपनी संस्कृति का
जन-जन में गुणगान करें।

आज देश में ऐसे लोगों का वर्चस्व है जो राजनीति का वीभत्स खेल खेलते हैं और आम जनता की बोली बंद करते रहते हैं। डॉक्टर कीर्ति वर्धन का जनवादी कवि ऐसे संतप्त जनमानस की आवाज बनकर मेरी आवाज नामक कविता में ललकारते हुए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करता है।
समसामयिकता के उन्मुक्त परिवेश में अब सारे संबंध दरकने लगे हैं। रिश्तो की गर्माहट ठंडी पड़ती जा रही है। हर चेहरा मुखौटो से ढका दिखने लगा है। इससे विश्वास का संकट पैदा हो गया है। इससे आहत कवि नकली बौद्धिकता के स्थान पर सात्विक रागात्मकता स्थापित करने के लिए समाज में भावुकता पूर्ण आग्रह कर रहा है

आओ एक गीत गा दें

नेह के दीपक बुझ रहे, फिर जला दें
धर्म के नाम पर भी सियासत हो रही है आस्था का कोई गीत गा दें।
संबंध भी बनने लगे अर्थ की नीव पर
रिश्तो के संसार को समर्थ बना दें।

डॉक्टर कीर्तिवर्धन जी की कविताओं में प्रेम प्रसंग और रूमानियत भी बड़े आकर्षक रूप में अभिव्यक्त है। सजीवन और प्रेम अनुभूति के मार्मिक क्षणों की स्मृतियां भी उनकी कविताओं को विशिष्ट बनाती हैं। प्रेम पत्र की बेवफाई पर प्रेमी हृदय का आहत स्वर ‘मेरे गीत मुझे लौटा दो’ नामक कविता में बड़ी मार्मिकता से प्रकट हुआ है –

तुम चाहती हो तुमको भुलूं, मैं भूलूंगा,
मेरे गीत मुझे लौटा दो मैं जी लूंगा।
गाये थे जो संग तुम्हारे मधुर क्षणों में
मेरे गीत मुझे लौटा दो मैं जी लूंगा।
छुपकर मिलना जग से डरना
आकर मेरी बांह पकड़ना।
यादें वादे, रस्में कसमें,
झूठे सच्चे सारे सपने
गीतों को फिर से गा लूंगा
तन्हा में आंसू पी लूंगा
मेरे गीत मुझे लौटा दो
मैं जी लूंगा ।
इस अभिनंदन ग्रंथ में श्री अश्वनी कुमार आलोक, डॉ प्रफुल्ल कुमार मौन, डॉ हरिकृष्ण अग्रहरि, डॉ नरेश पांडे चकोर, सुधांशु चक्रवर्ती, डॉक्टर योगानंद झा, अमर बानिया लोहोरो, डॉ मंतराम यादव, हरि नारायण सिंह हरि और अन्य कवियों कवित्रियों लेखक लेखिकाओं की रचनाओं ने इस विशाल अभिनंदन ग्रंथ की शोभा में चार चांद लगा दिए हैं। अतः सभी साहित्यकार, महानुभावगण प्रशंसा के पात्र हैं। इस अभिनंदन ग्रंथ के संपादक श्री आलोक जी को शत शत अभिनंदन है। आशा है यह ग्रंथ हिंदी साहित्य आकाश में यत्र तत्र सर्वत्र साहित्याकाश में यत्र यत्र सर्वत्र साहित्यिक सौरभ बिखरेता रहेगा।
धन्यवाद

डॉ हरिकृष्णअग्रहरि
संपर्क- अग्रहरि भवन
पोस्ट भिलाई वाया रक्सौल
जिला पूर्वी चंपारण बिहार 845 305 मोबाइल 70916 77606

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