निजी स्कूलों पर हो सर्जिकल स्ट्राइक, परेशान अभिभावक

डॉ अनुज अग्रवाल के साथ सचिन धवन

शाहपुर, निजी स्कूलों पर हो सर्जिकल स्ट्राइक,
परेशान अभिभावक

आजकल निजी विद्यालयों के संदर्भ में एक नया शब्द जुड़ता जा रहा है ‘लूट’। सवाल है कि आखिरकार ये ज्यादातर निजी विद्यालय हैं किसके? हमारे किसी नेता या बड़े व्यवसायी के। अब शिकायत करें भी तो किससे?
इन स्कूलों ने माता-पिता की मजबूरी का नाजायज फायदा उठाया है। कुछ लोग तो सरकार से अनुरोध कर रहे हैं कि एक बार निजी विद्यालयों द्वारा मनमाने तरीके से बढ़ाई जा फीस पर भी सर्जिकल स्ट्राइक होनी चाहिए।
कस्बे में स्कूल पूरी तरह मनमानी पर उतर आए हैं। मनमाने ढंग से फीस निर्धारित करने वाले निजी स्कूल संचालकों ने नया सत्र प्रारंभ होते ही ड्रेस, जूता, मोजा के साथ ही किताबें और पाठ्यक्रम भी बदल दिया है। क्वालिटी एजुकेशन के नाम पर अभिभावकों को लूटा जा रहा है।
स्कूल संचालकों ने कहीं कापी-किताबों और ड्रेस के लिए दुकानों से सेटिंग कर रखी है तो कहीं खुद स्कूल से बांट रहे हैं। फीस बढ़ाकर तो जेब भरी ही जा रही है, कापी-किताब और ड्रेस से भी मोटी कमाई की जा रही है। इन स्कूल संचालकों पर जिला प्रशासन का किसी तरह का कोई अंकुश नहीं है
कस्बे के निजी स्कूलों में अच्छी शिक्षा और व्यवस्था का लालीपॉप देकर अभिभावकों को ठगा जा रहा है। फीस निर्धारण में मनमानी करने वाले स्कूल संचालकों ने चालू शिक्षासत्र में 20-30 प्रतिशत फीस में इजाफा कर दिया है। जनरेटर के नाम पर प्रतिमाह फीस वसूलने वाले अधिकांश स्कूलों में बिजली गुल होने के बाद बच्चे गर्मी से बिलबिलाते रहते हैं। शहर के अधिकांश कान्वेंट स्कूल ऐसे हैं, जिनमें प्रतिवर्ष नए पाठ्यक्रम की पुस्तकें लागू कर दी जाती हैं, और वह भी एक निश्चित दुकान से खरीदने को मजबूर किया जाता है। महंगी पुस्तकों को बदलने और ड्रेस चेंज करने के पीछे और कुछ नहीं बल्कि अभिभावकों का आर्थिक शोषण करना लक्ष्य होता है।
जिसके नाम पर अभिभावकों के मुंह में हाथ देकर स्कूल संचालक मोटी फीस वसूल करते हैं
अभिभावकों ने निजी स्कूलों पर आरोप लगाते हुए कहा कि, स्कूल बंद होने के बावजूद भी ट्यूशन फीस में मेंटेनेंस चार्ज कन्वेंस चार्ज जोड़कर लिया जा रहा है और जो अभिभावक इसका विरोध कर रहे हैं, फीस जमा करने से मना कर रहे हैं, उनके बच्चों का स्कूल से नाम काट दिया जाता है. उन्हें ऑनलाइन क्लासेस में बैठने नहीं दिया जाता. इतना ही नहीं उनके बच्चों को परीक्षा में भी शामिल नहीं किया जाता. ऐसे में गरीब अभिभावक क्या करे?

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