ऐसे हालात बने जग में हर कोई दीखे भयभीत

ऐसे हालात बने जग में
हर कोई दीखे भयभीत
आशंकाओं से घिर कर
भूला मानव स्व अतीत

व्यथित थकित भ्रमित
आजीविका की तलाश
पेट की भूख मिटाने को
हुआ हताहत व निराश

कामकाज हो प्रभावित
बेरोजगारी के शिकार
बाहर निकलना दूभर
कंधों पर है घर का भार

नित नई अफवाह फैलें
आ रहा है तीसरा कहर
लोक डाउन घोषित हो
खाने को मिले न जहर

क्या करें कहां पै जाए
दिखती न सकूं की राह
असमंजस में जिन्दगी
फिर भी जन बेपरवाह

बच्चों का भावी सपना
शिक्षा दीक्षा का भाव
द्वंद घिरा जीवन उनका
मन पै प्रतिकूल प्रभाव

तटस्थ लगें ईश शक्ति
प्रकृति भी विपरीत हुई
हो गया पराजित अहम
आपदाओं की जीत हुई

हाथ नहीं तेरे कुछ भी
मानव सत्य को स्वीकार
कान्हा हरेंगी पीड़ा तेरी
करले परमब्रह्म से प्यार।

सत्यप्रकाश पाण्डेय

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